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रविवार, 14 सितंबर 2014

बाँसुरी चली आओ..


तुम अगर नहीं आयीं…गीत गा ना पाऊँगा.
साँस साथ छोडेगी सुर सजा ना पाऊँगा..
तान भावना की है..शब्द शब्द दर्पण है..
बाँसुरी चली आओ..होट का निमन्त्रण है..
तुम बिना हथेली की हर लकीर प्यासी है..
तीर पार कान्हा से दूर राधिका सी है..
दूरियाँ समझती हैं दर्द कैसे सहना है..
आँख लाख चाहे पर होठ को ना कहना है
औषधी चली आओ..चोट का निमन्त्रण है..
बाँसुरी चली आओ होठ का निमन्त्रण है
तुम अलग हुयीं मुझसे साँस की खताओं से
भूख की दलीलों से वक़्त की सजाओं ने..
रात की उदासी को आँसुओं ने झेला है
कुछ गलत ना कर बैठे मन बहुत अकेला है
कंचनी कसौटी को खोट ना निमन्त्रण है
बाँसुरी चली आओ होठ का निमन्त्रण है

बाँसुरी चली आओ, होंठ का निमंत्रण है...

राज़ सारे जीवन के मैं, बस तुम्हें बताता था.

शब्दों में न कह पाऊँ वो, सुरों में सजाता था..

बिन तुम्हारे राग सारे, रागिनी को भूले हैं..

अब ना वो बहारें हैं ना, सावन के झूले हैं..

आँधी में फ़सी शम्मा को, ओट का निमंत्रण है..

बाँसुरी चली आओ, होंठ का निमंत्रण है

मंगलवार, 16 जुलाई 2013

पतझर का मतलब है फिर बसंत आना है

 तूफ़ानी लहरें हों
अम्बर के पहरे हों
पुरवा के दामन पर दाग़ बहुत गहरे हों
सागर के माँझी मत मन को तू हारना
जीवन के क्रम में जो खोया है, पाना है
पतझर का मतलब है फिर बसंत आना है....!
राजवंश रूठे तो
... राजमुकुट टूटे तो
सीतापति-राघव से राजमहल छूटे तो
आशा मत हार, पार सागर के एक बार
पत्थर में प्राण फूँक, सेतु फिर बनाना है
पतझर का मतलब है फिर बसंत आना है.....!
घर भर चाहे छोड़े
सूरज भी मुँह मोड़े
विदुर रहे मौन, छिने राज्य, स्वर्ण.रथ, घोड़े
माँ का बस प्यार, सार गीता का साथ रहे
पंचतत्व सौ पर है भारी, बतलाना है
जीवन का राजसूय यज्ञ फिर कराना है
पतझर का मतलब है, फिर बसंत आना है......!

एक चेहरा था ,दो आखेँ थीं

एक चेहरा था ,दो आखेँ थीं ,हम भूल पुरानी कर बैठे ,
इक किस्सा जी कर खुद को ही, हम एक कहानी कर बैठे...!
हम तो अल्हड-अलबेले थे ,खुद जैसे निपट अकेले थे ,
मन नहीं रमा तो नहीं रमा ,जग में कितने ही मेले थे ,
पर जिस दिन प्यास बंधी तट पर ,पनघट इस घट में अटक गया ,
एक इंगित ने ऐसा मोड़ा,जीवन का रथ पथ भटक गया ,
जिस "पागलपन" को करने में ,ज्ञानी-ध्यानी घबराते है ,
... वो पागलपन जी कर खुद को ,हम ज्ञानी-ध्यानी कर बैठे...!
एक चेहरा था ,दो आखें थीं ,हम भूल पुरानी कर बैठे ,
इक किस्सा जी कर खुद को ही, हम एक कहानी कर बैठे...!
परिचित-गुरुजन-परिजन रोये,दुनिया ने कितना समझाया
पर रोग खुदाई था अपना ,कोई उपचार न चल पाया ,
एक नाम हुआ सारी दुनिया ,काबा-काशी एक गली हुई,
ये शेरो-सुखन ये वाह-वाह , आहें हैं तब की पली हुई ,
वो प्यास जगी अन्तरमन में ,एक घूंट तृप्ति को तरस गए ,
अब यही प्यास दे कर जग को ,हम पानी-पानी कर बैठे....!
एक चेहरा था ,दो आखें थीं ,हम भूल पुरानी कर बैठे ,
इक किस्सा जी कर खुद को ही, हम एक कहानी कर बैठे...!
क्या मिला और क्या छूट गया , ये गुना-भाग हम क्या जाने ,
हम खुद में जल कर निखरे हैं ,कुछ और आग हम क्या जाने ,
सांसों का मोल नहीं होता ,कोई क्या हम को लौटाए ?
जो सीस काट कर हाथ धरे , वो साथ हमारे आ जाए ,
कहते हैं लोग हमें "पागल" ,कहते हैं नादानी की है ,
हैं सफल "सयाना" जो जग में , ऐसी नादानी कर बैठे........!
एक चेहरा था ,दो आखें थीं ,हम भूल पुरानी कर बैठे ,
इक किस्सा जी कर खुद को ही, हम एक कहानी कर बैठे...!

शनिवार, 2 जून 2012

"कलरव ने सूनापन सौंपा ,मुझको अभाव से भाव मिले,
पीडाऒं से मुस्कान मिली हँसते फूलों से घाव मिले,
सरिताऒं की मन्थर गति मे मैने आशा का गीत सुना,
शैलों पर झरते मेघों में मैने जीवन-संगीत सुना,
पीडा की इस मधुशाला में,आँसू की खारी हाला में,
तन-मन जो आज डुबो देगा,वह ही युग का मीना होगा
मै कवि हूँ जब तक पीडा है,तब तक मुझको जीना होगा ....."

बुधवार, 23 मई 2012

पगली लड़की



अमावास की काली रातों में दिल का दरवाजा खुलता है,
जब दर्द की प्याली रातों में गम आंसूं के संग होते हैं,
जब पिछवाड़े के कमरे में हम निपट अकेले होते हैं,
जब घड़ियाँ टिक-टिक चलती हैं, सब सोते हैं, हम रोते हैं,
जब बार बार दोहराने से साड़ी यादें चुक जाती हैं,
जब ऊँच-नीच समझाने में माथे की नस दुःख जाती हैं,
तब एक पगली लड़की के बिन जीना गद्दारी लगता है,
और उस पगली लड़की के बिन मरना भी भारी लगता है.

जब पोथे खली होते हैं, जब हर सवाली होते हैं,
जब ग़ज़लें रास नहीं आतीं, अफसाने गाली होते हैं.
जब बासी फीकी धुप समेटें दिन जल्दी ढल जाता है,
जब सूरज का लश्कर छत से गलियों में देर से जाता है,
जब जल्दी घर जाने की इच्छा मन ही मन घुट  जाती है,
जब कॉलेज से घर लाने वाली पहली बस छुट जाती है,
जब बेमन से खाना खाने पर माँ  गुस्सा हो जाती है,
जब लाख मन करने  पर भी पारो पढने आ जाती है,
जब अपना मनचाहा हर काम कोई लाचारी लगता है,

तब एक पगली लड़की के बिन जीना गद्दारी लगता है,
और उस पगली लड़की के बिन मरना भी भारी लगता है....


जब कमरे मे सन्नाटे की आवाज सुनाई देती है,
जब दर्पण मे आँखो के नीचे झॉई दिखाई देती है,
जब बडकी भाभी कहती है, कुछ सेहत का भी ध्यान करो
क्या लिखते हो दिनभर, कुछ सपनो का सम्मान करो,
जब बाबा वाली बैठक में कुछ रिश्ते वाले आते है,
जब बाबा हमें बुलाते है, हम जाते है, घबराते है,
जब साडी पहने लडकी का एक फोटो लाया जाता है,
जब भाभी हमे मनाती है, फोटो दिखलाया जाता है,
जब सारे घर का समझाना हमको फनकारी लगता है,
तब एक पगली लड़की के बिन जीना गद्दारी लगता है,
और उस पगली लड़की के बिन मरना भी भारी लगता है....


दीदी कहती है उस पगली लडकी की कुछ औकात नही,
उसके दिल मे भैया तेरे जैसे प्यारे जज्बात नही,
वो पगली लडकी नौ दिन मेरे खातिर भूखी रहती है,
छुप–छुप सारे व्रत करती है, पर मुझसे कभी ना कहती है,
जो पगली लडकी कहती है, मै प्यार तुम्ही से करती हूँ,
लेकिन हूँ मजबूर बहुत, अम्मा–बाबा से डरती हूँ,
उस पगली लडकी पर अपना कुछ अधिकार नही बाबा,
ये कथा–कहानी किस्से है, कुछ भी तो सार नही बाब,
बस उस पगली लडकी के संग जीना फुलवारी लगता है,
और उस पगली लड़की के बिन मरना भी भारी लगता है.

~ Dr. Kumar Vishwas ~

बुधवार, 2 मई 2012

तुम्हे मैं प्यार नहीं दे पाऊँगा

ओ कल्पव्रक्ष की सोनजुही..
ओ अमलताश की अमलकली.
धरती के आतप से जलते..
मन पर छाई निर्मल बदली..
मैं तुमको मधुसदगन्ध युक्त संसार नहीं दे पाऊँगा
तुम मुझको करना माफ तुम्हे मैं प्यार नहीं दे पाऊँगा.
तुम कल्पव्रक्ष का फूल और
मैं धरती का अदना गायक
तुम जीवन के उपभोग योग्य
मैं नहीं स्वयं अपने लायक
तुम नहीं अधूरी गजल सुभे
तुम शाम गान सी पावन हो
हिम शिखरों पर सहसा कौंधी
बिजुरी सी तुम मनभावन हो.
इसलिये व्यर्थ शब्दों वाला व्यापार नहीं दे पाऊँगा
तुम मुझको करना माफ तुम्हे मैं प्यार नहीं दे पाऊँगा
तुम जिस शय्या पर शयन करो
वह क्षीर सिन्धु सी पावन हो
जिस आँगन की हो मौलश्री
वह आँगन क्या व्रन्दावन हो
जिन अधरों का चुम्बन पाओ
वे अधर नहीं गंगातट हों
जिसकी छाया बन साथ रहो
वह व्यक्ति नहीं वंशीवट हो
पर मैं वट जैसा सघन छाँह विस्तार नहीं दे पाऊँगा
तुम मुझको करना माफ तुम्हे मैं प्यार नहीं दे पाऊँगा
मै तुमको चाँद सितारों का
सौंपू उपहार भला कैसे
मैं यायावर बंजारा साँधू
सुर श्रंगार भला कैसे
मैन जीवन के प्रश्नों से नाता तोड तुम्हारे साथ सुभे
बारूद बिछी धरती पर कर लूँ दो पल प्यार भला कैसे
इसलिये विवष हर आँसू को सत्कार नहीं दे पाऊँगा
तुम मुझको करना माफ तुम्हे मैं प्यार नहीं दे पाऊँगा
तुम मुझको करना माफ तुम्हे मैं प्यार नहीं दे पाऊँगा

गुरुवार, 26 अप्रैल 2012

हर बार तुम्हारा चेहरा, हर बार तुम्हारी आंखे


हर बार तुम्हारा चेहरा, हर बार तुम्हारी आंखे,
हम खुद में कितना उतरे, हम खुद में कितना झांके,
हर बार तुम्हारा चेहरा, हर बार तुम्हारी आंखे..
हर बार यही लगता है, अब कुछ भी याद नहीं है,
हर बार गुमा होता है, कोई फैयाद नहीं है,
हर बार उम्मीदों वाली, सुबह आकार कहती है,
तुमसे बाहर आने में, अब कोई विवाद नहीं है,
पर कभी फूट पड़ती है, आँखों के सूखे जल में,
हर बार तुम्हारी कोमल, हर बार तुम्हारी शाखे,
हर बार तुम्हारा चेहरा, हर बार तुम्हारी आंखे.
हर बार हमी ने गाया दुनिया का दर्द कुवारा,
हर बार पिया है हस कर आसू का सागर सारा,
थक कर सोये है जब जब नींदों की हदबंदी में,
हर बार छलक जाता है आँखों से ख्वाब तुम्हारा,
मन पाखी ने जब चाहा इच्छा का अम्बर छूना,
हर बार उड़ाने उमड़ी हर बार कटी है पाखे,
हर बार तुम्हारा चेहरा हर बार तुम्हारी आंखे........
- डा ०  कुमार  विश्वास   

होठो पर गंगा हो, हाथो में तिरंगा हो....


शोहरत न अता करना मौला, दौलत न अता करना मौला
बस इतना अता करना चाहे, जन्नत न अता करना मौला,
शम्मा-ए-वतन की लौ पर जब, कुर्बान पतंगा हो.
होठो पर गंगा हो, हाथो में तिरंगा हो......

बस एक सदा ही सुने सदा, बर्फीली मस्त हवाओ में,
बस एक दुआ ही उठे सदा, जलते तपते सहराओ में,
जीते जी इसका मान रखे, मर कर मर्यादा याद रहे
हम रहे कभी न रहे मगर, इसकी सजधज आबाद रहे.
गोधरा न हो, गुजरात न हो इंसान न नंगा हो,
होठो पर गंगा हो, हाथो में तिरंगा हो.......

गीता का ज्ञान सुने न सुने, इस धरती का यशगान सुने,
हम सबद-कीर्तन सुन न सके, भारत माँ का जयगान सुने,
परवरदिगार मैं तेरे द्वार पर ले पुकार ये कहता हूँ
चाहे अजान न सुने कान, पर जय-जय हिन्दुस्तान सुने
जन-मन में उत्छल देशप्रेम का जलधि तरंगा हो
होठो पर गंगा हो, हाथो में तिरंगा हो.......
होठो पर गंगा हो, हाथो में तिरंगा हो...............